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वट सावित्री व्रत 16 मई को, शनि जयंती और शनि अमावस्या के विशेष संयोग से बढ़ा महत्व

 

छत्तीसगढ़ प्रयागराज न्यूज़ नवापारा राजिम —-हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य एवं अखंड सौभाग्य की कामना के साथ श्रद्धा एवं विधि-विधान से वट सावित्री व्रत रखती हैं। इस वर्ष यह पावन व्रत 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा। खास बात यह है कि इस बार वट सावित्री व्रत के दिन शनि जयंती एवं शनि अमावस्या का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है, जिससे इस तिथि का महत्व और अधिक बढ़ गया है।

ज्योतिषाचार्य एवं धर्माचार्य पंडित दिनेश तिवारी ने बताया कि वट सावित्री व्रत में वट अर्थात बरगद के वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनों देवों का वास होता है तथा इसे अक्षय वृक्ष का वरदान प्राप्त है। इसकी पूजा एवं परिक्रमा करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है तथा सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

उन्होंने बताया कि वट सावित्री पूजा के लिए विशेष रूप से भीगे हुए काले चने, बांस का पंखा, सुहाग सामग्री, वट के फल, मौसमी फल, कच्चा सूत, लाल या पीला धागा तथा मिठाई आदि पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर माता सावित्री की पूजा करती हैं और उन्हें सिंदूर अर्पित करना अत्यंत शुभ एवं महत्वपूर्ण माना जाता है।

पंडित तिवारी के अनुसार महिलाओं को इस दिन लाल, पीले, रानी या नारंगी रंग के वस्त्र धारण करना शुभ फलदायी माना गया है। पूजा के दौरान वट वृक्ष की 7, 11, 21, 51 अथवा 108 बार परिक्रमा करने का विधान है। हालांकि कच्चा सूत, लाल धागा या पीला धागा लपेटते हुए सात बार परिक्रमा करना सबसे अधिक प्रचलित एवं अनिवार्य माना जाता है।

परिक्रमा करते समय “ऊं वटा रूपाय नमः” मंत्र का जाप करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है तथा वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। धार्मिक मान्यता है कि माता सावित्री ने अपने तप, श्रद्धा एवं दृढ़ संकल्प से अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

इस वर्ष शनिवार के दिन वट सावित्री व्रत पड़ने से शनि देव की पूजा का भी विशेष महत्व रहेगा। श्रद्धालु इस दिन शनि मंदिरों में जाकर तेल, तिल एवं काले वस्त्र अर्पित कर शनि देव का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। धार्मिक जानकारों के अनुसार शनि जयंती, शनि अमावस्या और वट सावित्री व्रत का यह त्रिवेणी संयोग अत्यंत शुभ एवं दुर्लभ माना जा रहा है।

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